मेरी िजदंगी के कुछ अनजान लमहों ने पूछा हमें पहचानते हो ? मुझे लगा शायद ये मजाक है ! मेरा सवाल ओेर मेरा ही जवाब ? बचपन के िखलोैने या अाज ठहरती सांसे कुछ भी तो नही भूला ! स्कूल मे झूमते वो दो िवशाल बरगद घर से कुछ दूर था जंगल स्टोर थोड़ा फासले पर तालाब भी ........ हुआ करते थे ! सब दाँव पर लगा िदया ..... मेरे मािलक ! िवकास एक जरूरत थी ,,, दूसरे मुल्क तरक्की कर रहे थे ? लेिकन हम जंगलों में जी रहे थे अस्भ्य ओैर अपृत्यािशत जीवन !! मैने खुद को बदला ...... सोंच को बदला ........ ओैर खड़ा िकया ....... इमारतों , पुलों का िनजाम ...... कारों , जहाजों , मोबाइलों ओैर दवाओं का न िसमटने वाला दोैर ले अाया !! सीने को हाथों से दबाए चंद सांसों को थामता केैंसर ओैर एड्स से ...
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लगभग हर युग में इंसान अपने भगवान बनाता रहा.... कल्पनाओं में बनी स्वर्ग-नर्क, देवता-राक्षस, धर्म-अधर्म की गाथाएं सुनाता रहा!!!!!!!! सबके भगवान अपनी अपनी सभ्यताओं के साथ मर गए,,,, हां थोड़ा अंतर जरूर रहा भारत में... यहां प्रकृति के साथ भगवानों की कहानियां जुड़ गईं......... इंद्र अर्थात पुरंदर,, किलों बांधों को तोड़ कर पानी का रास्ता बनाने वाला।।।। पशुपति अर्थात शिव,, पहाड़ों, नदियों, जंगल, जीवों के लिए खुद को समर्पित करने वाला।।।।।। कृष्ण अर्थात गोपाल,, गौ-धन के जरिए भारत को ऊर्जा आपूर्ति कराने वाला, गीता के जरिए मानव तक अध्यात्म पहुंचाने वाला।।।।।।। और राम जीवों के मध्य प्रेम करुणा और मैत्री स्थापित करने वाला।।।।।।।। भारत,,, जिंदा रहा अनादि कालों से क्योंकि तब १००% कीटाणुओं को मारने वाली तकनीकि नहीं खोजते थे।।।।।।। भारत जानता था हम जिंदा तभी तक हैं जब तक ये सब जिंदा हैं।।।।।।।।।।। हरि ॐ राम यादव 21.11.23
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